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दशहरे पर शोक मनाते हैं राजस्थान के जोधपुर में रहने वाले रावण के वंशज

भारत में त्योहारों को काफी महत्व दिया जाता है 1 वर्ष में भारत में अनगिनत त्यौहार आते हैं जिन्हें भारतवासी पूरे जोर-शोर से मनाते हैं। दिवाली का त्यौहार भारत में सबसे अधिक महत्व रखता है। क्योंकि यह अयोध्या में श्री राम और सीता के आगमन पर मनाया गया था। तब अयोध्या वासियों ने दीपक जलाकर उनका स्वागत किया था। जैसा कि आप जानते हैं दीपावली से कुछ दिनों पहले दशहरे का त्यौहार मनाया जाता है।

दशहरे पर जहां लोग रावण दहन कर बुराई पर अच्छाई की जीत का पर्व मनाते हैं तो वहीं एक ऐसा समाज भी है जो लंकापति के दहन पर शोक में डूब जाता है. रावण के वंशज होने का दावा करने वाले गोधा श्रीमाली समाज के लोग इस दिन शोक मनाते हैं.दशहरे के मौके पर रावण दहन के बाद इस समाज के लोगों की ओर से रावण दहन के धुएं को देखकर स्नान करते हैं और उसके बाद जनेऊ बदल कर ही खाना खाते हैं

मान्यता है कि जब रावण विवाह करने जोधपुर के मंडोर आए थे तब यह ब्राह्मण उनके साथ बारात में आए थे। विवाह करके रावण वापस लंका चला गया, लेकिन यह लोग यहीं रह गए। तब गोधा गोत्र के श्रीमाली ब्राह्मण यहां रावण की विशेष पूजा करते आ रहे हैं। ये रावण का दहन नहीं देखते, बल्कि उस दिन शोक मनाते हैं। यहां तक कि श्राद्ध पक्ष में दशमी पर रावण का श्राद्ध, तर्पण आदि भी करते हैं।

अपनों के निधन के बाद जिस तरह स्नान कर यज्ञोपवीत बदला जाता है, उसी प्रकार रावण के वंशज दहन के बाद शोक के रूप में लोकाचार स्नान कर कपड़े बदलते हैं। जोधपुर में श्रीमाली ब्राह्मण में गोधा गोत्र के ब्राह्मण रावण के ही वंशज हैं, इसलिए वे रावण दहन नहीं देखते। जोधपुर में इस गौत्र के करीब 100 से ज्यादा और फलोदी में 60 से अधिक परिवार रहते हैं।

जोधपुर के सूरसागर स्थित मेहरानगढ़ दुर्ग की तलहटी में वर्तमान समय में रावण का मंदिर भी बना हुआ है यह मंदिर कई साल पुराना है और श्रीमाली समाज के कमलेश दवे ने इस मंदिर को बनवाया था और उनकी ओर से दशहरे के दिन इस मंदिर में रावण की भव्य पूजा-अर्चना भी की जाती है.

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